January 7, 2017

भारत की सैन्य कूटनीति के सामने चुनौतियां




The following article on India's military diplomacy, appeared in Hindi on the Observer Research Foundation web site. An excerpt is below, and the full text can be found here.
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत की आजादी के बाद के इन सात दशकों के दौरान अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सैन्य बलों की प्रकृति में बदलाव आया है। भारत को बड़ा परम्परागत युद्ध लड़े लगभग 45 साल बीत चुके हैं और उसके बाद भारत द्वारा परमाणु हथियार बनाने, भारत और उसके पड़ोसियों के बीच बदलते वाणिज्यिक, राजनीतिक और सामाजिक रिश्ते और श्रीलंका में आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई में भारत के भाग लेने सहित घटनाओं ने बड़े पैमाने पर युद्ध की संभावनाओं को और घटा दिया है। हालांकि भारतीय सशस्त्र बलों की संरचना और तैयारियों को अब तक इन बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नहीं ढाला जा सका है।
सैन्य कूटनीति मानी जा सकने वाली गतिविधियों में से एक व्यापक फ्रीक्वेंसी और विजिबिलिटी — और उसके परिणाम के व्यापक महत्व को अपेक्षाकृत नजरंदाज किया गया। शांतिकाल में और एक ऐसे अंतर्राष्ट्रीय वातावरण में, जहां भारत के कुछ घोर विरोधी और अनेक साझेदार हैं, ऐसा होना स्वाभाविक है। वैसे सैन्य कूटनीति अथवा रक्षा कूटनीति की कोई सार्वभौमिक परिभाषा तो नहीं है, लेकिन कहा जा सकता है कि यह स्पष्ट तौर पर कूटनीतिक उद्देश्य से की जाने वाली कोई भी सैन्य गतिविधि है, या दूसरे शब्दों में कहें कि ये ऐसी गतिविधियां हैं, जिनका प्रमुख उद्देश्य अन्य देशों में भारत के प्रति सदभावना को बढ़ावा देना है।
भारत ने ब्रिटिश राज से विरासत में मिले विशाल, पेशेवर सैन्य बल, अपने आकार और खुद को उपनिवेशवादी युग के बाद की दुनिया के नेता के रूप में प्रस्तुत करने के गुणों की बदौलत, लगभग आजादी के बाद से ही विदेशों के साथ अपने संबंधों में सैन्य कूटनीति का उपयोग किया है। लेकिन हाल के वर्षों में सैन्य कूटनीति की बढ़ती मांग और आकर्षण की वजह से उसे अनेक गतिविधियों के लिए बड़े पैमाने पर संसाधन, कर्मियों और उपकरणों की आवश्यकता होगी। इनमें विदेशी अधिकारियों को प्रशिक्षण और शिक्षा देना, दूसरे देशों में बड़े पैमाने पर ध्यान आकर्षित करने वाले सैन्य दौरे और विदेश में मानवीय सहायता एवं आपदा राहत के प्रयास (एचएडीआर) शामिल हैं। बेहतर सैन्य कूटनीति के लिए संसाधनों से कहीं ज्यादा बढ़कर, सेनाओं के बीच, भारत के सैन्य और नागरिक नेतृत्व के बीच और रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के बीच ज्यादा निकट सहयोग की आवश्यकता है।